Women’s Day- इस बार कोई महिला नहीं बल्कि एक ‘पुरुष’

हमारा पुराना कपड़ा किसी को नया कर जाता है…

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Priti Nonia
अंशु गुप्ता ‘गूँज’  नामक ग़ैर सरकारी संस्था के संस्थापक जिन्होंने बदली  कई असहाय महिलाओं की ज़िंदगी ।
2015 में ‘रेमनमैगसेसे’ से सम्मानित अंशु गुप्ता का जन्म उत्तराखंड में हुआ था ।देहरादून से स्नातक करने के बाद दिल्ली का रुख किया और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता का कोर्स किया. उसके बाद उन्होंने बतौर कॉपी राइटर एक विज्ञापन एजेंसी में काम करना शुरू कर दिया. फिर कुछ समय बाद पावर गेट नाम की एक कंपनी में दो साल काम किया. वो कहते हैं , ना जब दुनिया बदलने की इच्छा मन में हो तो किसी और काम में मन ही नहीं लगता । अंशु बताते हैं मुझे समाज की समस्या समझ आने लगी और मैंने इसका समाधान निकालना शुरू किया,और फिर रास्ते बनते गए और कारवाँ जुड़ता गया ।वह कुछ ऐसा करना चाहते थे,जिससे समाज को कुछ फायदा हो.  समाज में बदलाव आए ।यहाँ से उन्होंने1999 में ‘गूंज’ नाम की एक संस्था की नींव रखी.गूंज का मकसद था, पुराने कपड़ों को जरूरतमंदों तक पहुंचाना। यह काम अंशु ने अपनी आलमारी में रखे पुराने 67 कपड़ों  से शुरू किया था , आज गूँज 22 राज्यों में सलाना 3000 टन कपड़ों का वितरण  करती है । अंशु गुप्ता की कीर्ति गिनाए भी नहीं गिनाई जा सकती । इनका नारा है ‘काम के बदले कपड़ा , यानी पिछड़े इलाक़ों में जहाँ पुलिया की कमी है या कच्चे रास्ते  बने हुए हैं ,कुओं कि सफ़ाई आदि सामाजिक काम करके , जिससे सामुदायिक कल्याण हो।उसे वहाँ के लोग मिलजुलकर करके अपने ज़रूरतों के हिसाब से कपड़ा पाते हैं।अंशु जी बताते है हमारे यहाँ काम करने वाली महिलाओं की तादाद ज़्यादा है ,तक़रीबन 90 फ़ीसद ऋषिकेश में तो 186 महिलाएँ हैं जिनमें पुरुष केवल 5 हैं गूँज की कुल कामगारों में पुरुषों का प्रतिशत मात्र 10-15 फ़ीसद ही है , यानी पूरी गूँज महिलाओं पर ही निर्भर है,अंशु जी को छोड़ कर ।
अंशु का कहना है हमारे समाज में आज भी महिलाओं को समान हक़ समान वेतन नहीं मिलता है समाज में आज भी महिला पुरुष की  बीच की खाई बरक़रार है ,भारत में आजभी महिलाएँ खुले आम सड़कों पर नहीं घूम सकती हैं , अगर कोई लड़की अपने कान में हेड्फ़ोन लगकर घूमती है तो वह शौक़िया नहीं बल्कि पुरुषों के उस तबके से बचना चाहती हैं जो उसे देखकर उसकी शारीरिक बनावट पर कॉमेंट पास करता है। आज भी भारत ऐसा ही है ,सिस्टम चाहे जितनी बातें कर ले  विज्ञान भवन में चार लड़कियों को मेडल दे उससे ज़मीनी सचाई बदलने वाली नहीं है ,सिस्टम को ज़मीन से जुड़ कर काम करने की ज़रूरत है ,और गूँज इसी दिशा में काम करती है । गूँज में काम करने वाले महिला और पुरुष कर्मचारियों के वेतन समान हैं ।उससे भी बड़ी बात यह है की उनके आत्मस्वाभिमान का सम्मान किया जाता है ।गूँज में महिलाओं को किसी  भी पुरुष  से कम नहीं आँका जाता है बल्कि पुरुष ही  उनके मुक़ाबले कमतर साबित होते हैं कर्मचारियों की बेटियाँ के लिए भी योजना है 21 साल होते ही या 12वीं पास करते ही आर्थिक सुविधाएँ दी जाती हैं । ताकि वह आगे पढ़ सके ।
अंशु बताते हैं  की,हमारे यहाँ महिलाओं की तादाद इसीलिए ज़्यादा है क्यूँकि,महिलाएँ पुरुष के बराबर ही काम करतीं हैं हमारे यहाँ  गूँज में महिलाएँ ट्रक  तक लोड कर देती  है तो कहाँ  से कम हैं  ये महिलाएँ ?महिलाओं  को उचित मंच नहीं मिलता है नहीं तो ,भारत  की महिलाएँ आसमान छूँ लेंगी ।गूँज संस्थान में कार्यरत ‘उषा’ जो कि बिहार की  रहने वाली  हैं ,वह बताती हैं के 20 साल की उम्र में ही उनकी पति  की मौत हो गई और एक बेटी को साथ लेकर दिल्ली अपने भाई के पास आ गई और साथ ही एक हँथेलि कटी होने  का दुःख , भी साथ लाई ऐसी स्थिति में पहले घर घर जाकर काम करना पड़ता था ,बाद में गूँज का साथ  मिला आज उषा  जी ख़ुश हैं उनकी बेटी की शादी भी हो  गई है गूँज ने उषा को आर्थिक तौर पर ना सिर्फ़ सशक्त बनाया बल्कि सम्मान के साथ जीने का हक़  भी दिया।उषा जैसी  ना जाने कितनी नारी सशक्तिकरण कि कहानियाँ गूँज कि 22 राज्यों के 250 केंद्रों में सांसें लें रहीं हैं ,गूँज में ऐसे तो बहुत सारी योजनाएँ हैं लेकिन, सबसे महत्वपूर्ण योजना क्लोथ फ़ोर वर्क (cloth for work) और NJPC(Not just a piece of cloth ) NJPC एक ऐसी पहल जहाँ सूति कपड़ों  को काटकर महिलाओं के मासिक धर्म के लिए साफ़ सुथरे कपड़े का पैड बनाया जाता है फिर उसे एक साफ़ सुथरे पैकेट में बंद कर  एक कीट के रूप में जिसमें पैड ,पेंटी , पैड रखने की काग़ज़ की डिब्बी ताकी दोबारा प्रयोग किया जा सके आदि भरकर इस कीट को दूर दराज़ के पिछड़ें इलाक़ों में भेजा  जाता है ।गूँज की कार्यकर्ताओं द्वारा  वहाँ जाकर    महिलाओं के मासिक धर्म  को लेकर जागरूकता फैलाया जाता है जो अपने आप में सराहनीय है ।
अंशु जी का कहना है कि चंद कामयाब महिलाओं की कामयाबी पे अपनी पीठ थाप थपाना आसान है , पर उन आम महिलाओं का क्या जिनके पास आज भी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं । आज़ादी के सत्तर साल के बाद भी भारत की महिलाओं की स्थिति विकट ही दिखती है । सिस्टम को महिलाओं के लिए एक ट्रैक बनाना होगा जिसके सहारे महिलाएँ अपने सपनों को पा सकती है । सिस्टम को यह समझना होगा की महिलाओं में बहुत शक्ति है बस ज़रूरत है तो उन्हें उनकी बुनियादी हक़ देने कि ………………………………. 
                                                                गूँज
                                                            प्रीति नोनियाँ
                                 भारतीय जनसंचार संस्थान (नई दिल्ली)
                                 रेडियो और टेलिविज़न विभाग 

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